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श्री गणेशजी

भारतीय ज्योतिष मे भदावरी ज्योतिष के प्रयोग भदावरी ज्योतिष मे भगवान सूर्य सूर्य ग्रह के कारकत्व सूर्य के अन्य ग्रहो के साथ कार्य सूर्य+मन्गल सूर्य+बुध सूर्य+गुरु सूर्य+शुक्र सिह का शनि शनि+गुरु+मंगल=आरक्षण श्री गणेशजी प्राण क्या है ? ग्रह भगवान की तरफ़ जाने का रास्ता देते हैं गोचर कैसे काम करता है?



श्री गणेशजी
श्री गणेशाय नम:
सन्सार मे गण्शजी की पूजा इस लिये की जाती है,कि वे शरीर मे हर अन्ग के सन्चालन की क्षमता देते है,जब समय पर सभी अन्ग सुचारु रूप से काम करते है तो शरीर हर काम को कर सकता है,भगवान गणेशजी शरीर मे नाक की जगह हवा को सून्घने की क्षमता देते है,स्वाद को चखने की क्षमता जीभ के द्वारा देते है,क्योकि स्वाद पानी की क्षमता से पता किया जा सकता है,शरीर मे अग्नि की क्षमता का पता गणेशजी महशूस करने की शक्ति से देते है,और अग्नि को शरीर मे धारण करने की शक्ति का निर्धारण भी गणेशजी ही करते है,इस शरीर मे आग को धारण करने पर भी शरीर जलता नही है,शरीर के हर भाग मे अग्नि का बास है,अगर लगातार आग कितने ही ताप की हो शरीर मे रखी रहेगी,तो शरीर का कोई ना कोई भाग तो जलेगा ही,एक साल नही दो साल नही पूरे के पूरे सौ साल तक आग शरीर मे रखी रहती है,कोई भाग जलता नही है,पानी भी शरीर मे रखा रहता है,शरीर गलता नही है,हवा भी शरीर मे आती जाती रहती है,शरीर सूखता नही है,मिट्टी भी शरीर मे रहती है शरीर आग और पानी के लगातार रखे होने पर पत्थर की तरह से पकता नही है,कान से सुनना,नाक से सून्घना,मुह से खाना,आन्खो से देखना,दिमाग से सोचना,त्वचा से महसूस करना,यह शरीर मे कौन करता है,यही गणेशजी ही करते है । ज्योतिष मे गणेशजी को केतु कहा गया है,शरीर मे कितने ही ज्योतिषियो ने केतु की गणना केवल पेट की आन्तो से और हाथ पैर के जोडो से ही की है,जो भी अन्ग का हिस्सा किसी कार्य के करने मे सहायता देता है वही गणेशजी का रूप है,शरीर के बाद बाहरी अन्गो मे गणेशजी ही पत्नी है,पुत्र और घर के रहने और शरीर को साधने का काम गणेशजी के रूप मे ही करती है,खाना बनाती है,पानी पिलाती है,बिछौना लगाती है,शरीर मे बढी हुई शक्ति को सम्भोग के द्वारा कम करती है,जितनी शक्ति बढ गई होती है उससे आगे के लिये सन्तान का निर्माण करती है,अपनी आवश्यक्ताओ की फ़रमाइस करने के बाद कितने ही गणेशजी को दिन भर मिलवाती है,कोई काम के लिये सहारा देने के लिये गणेशजी के रूप मी आता है,कोई काम के बदले मे मेहनताना चुकाने के लिये गणेशजी के रूप मे आता है,कोई घर के खर्चो को करने के लिये गणेशजी के रूप मे आता है,पुत्र के रूप मे नाम बढाने के लिये,साले के रूप मे इज्जत बढाने के लिये,भान्जे के रूप मे जो भी काम बहिन ने समाज मे लम्बी दूरी तक अपनी सन्चार व्यवस्था कायम रखने के लिये काम किया था,उसका भुगतान लेने और देने के लिये,एक बार नही दो बार मा का दर्जा देने के लिये सामने आता है,और कहता है,मामा,अपनी माता को तो एक बार ही मा कहता है,मगर मामा को दो बार मामा कहता है,कुत्ते के रूप मे केवल रोटी के टुकडे पर दरवाजे की रखवाली दरवेश के रूप मे गणेशजी करते है,छिपकली के रूप मे अन्धेरे मे छुपे जहरीले कीडो को गणेशजी ही खाते है,पानी पिलाने के लिये ग्लास के रूप मे गणेशजी ही होते है,लिखने के लिये पेन भी गनेशजी का ही रूप होता है,टेलीफोन भी तो गणेशजी ही है,कम्प्यूटर भी गणेशजी है,जब सब जगह गणेशजी ही है तो बाकी तो गणेशजी को सहायता देने वाले नौकर ही तो है,सूर्य राजा बनकर राज्य रूपी गणेशजी की सहायता करते है,मन्गल सिपाही बनकर गणेशजी की रक्षा करते है,बुध ग्यान बन कर,बोली बनकर,जोडने घटाने की विद्या बनकर,बहिन बुआ बेटी बनकर सहायता करता है,गुरु हवा बनकर धर्म बन कर भाग्य बनकर जानकारी बनकर गनेशजी की सहायता करता है,शुक्र गणेशजी को सजाता है,शनि गणेशजी को विभिन्न रूप देता है,राहु गणेशजी मे भला करने की शक्ति देता है,मतलब सभी ग्रहो को अगर अपने वश मे करना है तो गणेशजी से तो पूछना ही पडेगा,गजाननम,छोटा सा शब्द है,हाथी के मुख के लिये प्रयुक्त किया जाता है,अगर ग को अलग कर दिया जावे,तो जाननम ही तो रह जायेगा,जो ग को जान गया है, वह ही गजाननम को जान गया है,भूत गणादि कोई भूत पिशाच नही है,भूत बीता हुआ है,गण साथ देने बाला है,आदि से मतलब बहुत ही पुराने जमाने से बताया जाता है,जो गणो के रूप मे बहुत ही पुराने जमाने से साथ है,वही गणेशजी है,कपित्थ जम्बू फल गणेशजी नही खाते है,बात भेद की है,बताया गया है कि जब से मानव रोटी और मिठाई नही खाकर,घास फूस और जम्बू फल खा कर जिन्दा था,तब से ही गणेशजी को माना जाता था,कितनी पुरानी बात को कहा है,लोग गणेशजी को ही जम्बू फल और दूब घास खिलाने लग गये,मोदक प्रिय का मतलब लड्डू प्रिय नही है,मोद यानी उत्साह के साथ,जो उनकी अर्चना करता है,वही उनको प्रिय है । श्री गणेश का नाम लिया तो बाधा फ़टक न पाती है,बाधा का मतलब ही नही आता है,बा और धा को अलग अलग पढ कर देखो,बाधा को उल्टा पढ कर देखो धाबा जो करे,वही बाधा कहलाये,धाबा कब होता है जब किसी न किसी रूप मे कोई भी अन्ग शक्तिहीन हो,शक्तिहीन कब होन्गे,जब श्री गणेशजी को नही माना होगा,जब सब ओर ही गणेशजी है तो फिर क्यो इस भन्वरजाल मे अपने को अपना पराया कहे जा रहे हो,गणेशजी के दरवाजे पर शुभ लाभ को लिख दिया,लाभ को तो पढ लिया,मगर लाभ का उल्टा भी पढ लेते,भला नही पढा होगा,भला पढो तो लाभ होगा ही,इसी तरह से कहे जाते हो कि गणेशजी दया नही करते है,दया को उल्टा पढ कर देखो,याद ही तो होता है,जब गणेशजी को याद करोगे तो वे दया करेन्गे,जरूर करेन्गे,टीवी सिनेमा,तमाशा,सब माया रूपी नर्तकी के रूप मे जग को उल्झाये हुए है,केवल नर्तकी को उल्टा पढ कर देखो,केवल गणेशजी का कीर्तन ही रह जायेगा,क्योकि नर्तकी का उल्टा ही कीर्तन है,बनाने वालो ने गणेशजी की तस्वीर को बहुत ही दिमाग से बनाया है,सर्व व्यापक औम को बिठा दिया,कारण भी अजीब था,रूप को देने के लिये जब कोई छबि नही मिली तो तो सोचा कि जिसमे सम्पूर्ण जगत समाया है,उसी को बिठा दिया जाये,खोजने पर केवल औम ही मिला,गम गणपतये नमो नम:,कहना तो चालू कर दिया,मतलब उल्टा ही निकला,जब साफ़ तरीके से नाम लेना ही नही आता है,तो भीख भी कैसे मिलेगी,भगवान गणेशजी का कहना है कि जो मागो वही मिलेगा,रोटी को रोती कहो तो जिससे मागोगे,वह तो समझेगा कि,घर मे कोई रोने बाला ही नही है किसे दे दिया जाये,गम और गन्ग मे यही मतलब है,गन्ग का मतलब ग रूपी अन्ग,गम का मतलब दुख,अब सोचो,कैसेट तो भरने बालो ने भर दी,सुर ताल का खेल कर दिया,झूमने लगे,नाचने लगे,गम गनपतये नमो नम:,अरे समझ कर कहो,भगवान का नाम है,गन्ग गनपतये नमो नम:,सिद्ध विनायक,का मतलब भी विनय एक है,एक ही विनय को विनायक कहा जाता है,एक को ही विनय करो,सिद्धि मिल जायेगी,दिमाग मे खूबशूरती से एक ही पेन्टिन्ग बना डालो,श्री गणेशजी की,अकेले मै बैठ कर उसमे धीरे धीरे रन्ग भरो,जब दिमागी पेन्टिन्ग पूरी तरह से बन जाये तो,फिर अपनी प्रार्थना,उसी दिमागी पेन्टिन्ग से करो,आप के ही दिमाग मे श्री गणेशजी की तस्वीर आपके हर सबाल की जबाब देने लगेगी,देखना कितनी जल्दी भगवान गणेशजी के रन्ग मे रन्ग जाते हो,जो काम अभी तक नही बन रहे थे,दिमागी पेन्टिन्ग से प्रार्थना करते ही बनने लगेन्गे ।
जय श्री गणेश
रामेन्द्र सिह भदौरिया,(www.astrobhadauria.com)
३७ पन्चवटी कालोनी,
जयपुर
फोन-२२२१५७३