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शनि+गुरु+मंगल=आरक्षण

भारतीय ज्योतिष मे भदावरी ज्योतिष के प्रयोग भदावरी ज्योतिष मे भगवान सूर्य सूर्य ग्रह के कारकत्व सूर्य के अन्य ग्रहो के साथ कार्य सूर्य+मन्गल सूर्य+बुध सूर्य+गुरु सूर्य+शुक्र सिह का शनि शनि+गुरु+मंगल=आरक्षण श्री गणेशजी प्राण क्या है ? ग्रह भगवान की तरफ़ जाने का रास्ता देते हैं गोचर कैसे काम करता है?



इधर फिर से आरक्षण की बात शुरु हो गयी है। उच्च शिक्षण संस्थानो जैसे आई आई टी और आई आई एम में आरक्षण को 49% प्रतिशत से अधिक करने की चर्चा मात्र से छात्रों,शिक्षाविदों और टीवी चैनलों पर वाद विवाद शुरु हो गया है।अकेले अर्जुन सिंह के पास कोई दाँव नही था, चलाने के लिये, इसलिये इतिहास मे दर्ज होने के लिये आखिरी दाँव चला है। पता नही ये सठियाई उम्र का खेल है या फिर सोची समझी राजनीति, लेकिन कुछ भी हो है, बहुत गन्दी।मगर क्या करें गन्दा है पर धन्धा है ये

 

अपने छोटे से फायदे के लिये ये राजनीतिज्ञ कुछ भी कर सकते है।अब अर्जुन सिंह को ही लो, उन्हे क्या हासिल हुआ? जब बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी, शिक्षा का भगुवाकरण करने की कोशिश मे जुटे हुए थे, तब कांग्रेस वाले चीख चीख कर बवाल मचा रहे थे, अब देखिये, अर्जुन सिंह ने आते ही भगुवाकरण को मुसलमानो के तुष्टीकरण मे बदल दिया। बीच बीच मे मार्क्सवादियों ने भी अपनी अपनी चलाई। चलो यहाँ तक तो ठीक था लेकिन पंगा अब शुरु हुआ है, जब आरक्षण का भूत फिर से बक्से से बाहर निकला है, इसके जिम्मेदार है अर्जुन सिंह।

 

आज जब भारत तरक्की की राह पर आगे बढ रहा है तो उसे फिर से पीछे धकेलने की साजिश है ये।समाज को दो हिस्सों मे बाँटने की साजिश है।मै तो आरक्षण के औचित्य पर ही सवाल उठाता हूँ।आजादी के साठ साल बाद भी यदि हम आरक्षण की राजनीति करते रहे तो लानत है हम पर। मेरे कुछ सवाल है, शायद कोई आरक्षण समर्थक जवाब देना चाहे:

 

    * क्या दलित आज भी पिछड़े हुए है? यदि पिछड़े हुए है तो आजतक के आरक्षण का किया धरा सब पानी मे गया। है ना? और यदि नही पिछड़े है तो काहे का आरक्षण?

    * देश मे एक व्यक्ति एक संविधान क्यों नही लागू होता?

    * आरक्षण से दलित वर्ग को आज तक कितना लाभ हुआ?

    * हम हर जगह खुली प्रतियोगिता की बात करते है, तो फिर सभी नागरिको समान प्रतियोगिता का अवसर क्यों नही देते?

    * कब तक हम वर्ग विशेष को आरक्षण प्लेट मे रखकर देते रहेंगे?

    * सामजिक न्याय के नाम पर हम कब तक योग्य प्रतिभा का गला घोंटते रहेंगे?

    * कब तक ये वोट की गन्दी राजनीति चलती रहेगी?

 

अर्जुन सिंह कोई समय सीमा निर्धारित कर सकते है क्या? कि कब तक दलित वर्ग और पिछड़ा वर्ग समाज की बराबरी कर सकेगा। यदि हाँ तो समय सीमा निर्धारित करें और यदि नही तो आरक्षण का कोई औचित्य नही।उच्च संस्थानों मे आरक्षण लाकर हम उन संस्थानों की शिक्षा स्तर के साथ समझौता करेंगे। इससे विश्व बाजार मे हमारे प्रोफ़ेशनल्स की कीमत गिरेगी ही। दूसरी तरफ़ आरक्षण लाकर हम परोक्ष रूप से छात्रों को विदेश मे पढने के लिये प्रोत्साहित करेंगे। जिसका मतलब ये हुआ कि एक तरफ़ तो हम विदेशी मुद्रा खर्च करेंगे और दूसरी तरफ़ प्रतिभा पलायन का रास्ता खोल रहे हैं।

 

इस मसले का सीधा सीधा समाधान ये है कि अर्जुन सिंह को आरक्षण विरोधी छात्रों के समुह मे छोड़ दिया जाना चाहिये(बिना सुरक्षा के)। वे अगर छात्रों को कन्वीन्स कर सकें तो ठीक, नही तो अर्जुन सिंह तो पूरी तरह से कन्वीन्स कर ही दिए जायेंगे।

 

 

भारतीय संसद के निर्माता आदरणीय भीमराम अम्बेदकर जी ने हिन्दू धर्म की अस्पृश्यता की नीति के कारण बहुत कुछ सहा था, उन्होंने आरक्षण नीति की परिकल्पना की और लागू किया जिसका मूल उद्देश्य अछूत समझी जानेवाली अनुसूचित जाति और आदिम अधिवासी, वनवासी अर्थात् अनुसूचित जनजाति के लोगों को कुछ विशेष सुविधाएँ तथा रियायत देकर सामान्य लोगों के बराबर लाना था। लेकिन इस नीति का मूल उद्देश्य भटक गया है।

इस सम्बन्ध में कुछ ज्वलन्त प्रश्न हैं?

 

अ.जा./अ.ज.जा. के कुछ व्यक्ति वर्तमान उच्च पदों पर हैं, कुछ अत्यन्त धनवान हैं, कुछ करोड़पति अरबपति हैं, फिर भी वे और उनके बच्चे आरक्षण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, ऐसे सम्पन्न लोगों के लिए आरक्षण सुविधाएँ कहाँ तक न्यायोचित है? कब तक चलेगा ऐसा?

 

जाति प्रथा केवल हिन्दू धर्म में ही हैं। फिर भी कुछ हिन्दू जो मुश्लिम या ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं, अर्थात् सामान्य वर्ग में आ चुके हैं, फिर भी वे आरक्षण नीति के अन्तर्गत अनुचित रूप से विभिन्न सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। उन्हें रोकने के लिए क्या कानूनी कार्यवाही हो रही है?

 

भारत के आदिम अधिवासी अर्थात् अ.ज.जा. वे ही हैं जो सैंकड़ों हजारों वर्षों से इस भूमि की सन्तान हैं? इतिहास बताता है कि मुगल और अंग्रेज यहाँ लुटेरों व शोषकों व आक्रामकों के रूप में आए। अतः जो अ.ज.जा. के लोग मुश्लिम या ईसाई धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, उनके लिए कोई भी आरक्षण व्यवस्था नहीं लागू होनी चाहिए।

 

कुछ लोग अ.जा./अ.ज.जा. भी हैं, मुश्लिम या ईसाई या अन्य धर्मावलम्बी भी, एक ओर आरक्षण सुविधाओँ का लाभ ले रहे हैं, दूसरी ओर अल्पसंख्यकों के लिए सुविधाओं का भी। क्या यह कानूनी और नैतिकता के अनुरूप है?

 

जैसे शिक्षा के लिए दाखिले, नौकरी के लिए चयन में रियायत दी जाती है, वैसे ही खेलकूद के क्षेत्र में आरक्षण नीति लागू होनी चाहिए???? अ.जा./अ.ज.जा. के धावक के लिए सिर्फ 80 मीटर की रेंज होनी चाहिए, जबकि सामान्य वर्ग के धावक के लिए 100 मीटर हो। क्रिकेट में सामान्य बल्लेबाज के लिए जहाँ 4 रन बनें, वहीं अ.जा./अ.ज.जा. के खिलाड़ी के लिए 6 रन माना जाए???? गेंदबाज जहाँ सामान्य बल्लेबाज के लिए 100 यूनिट की गति से गेंद फेंके, वहीं अ.जा./अ.ज.जा. के बल्लेबाज के लिए उसे 80 यूनिट की गति से गेंद फेंकनी होगी????

 

यह अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि भारत के राजनेता मंत्रियों का ईलाज सिर्फ अ.जा./अ.ज.जा. के डॉक्टर ही करें? मंत्रियों/राजनेताओं के लिए विशेष रूप से चलाए जानेवाले चार्टर्ड हवाई जहाज को केवल अ.जा./अ.ज.जा. के पायलट ही चलाएँ?

 

आरक्षण नीति का वास्तविक प्रयोजन सामान्य वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए ही है, क्योंकि उन्हें तगड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है तो वे सच्चे सोने जैसे हीरो एवं हीरोईन बनेंगे न! जबकि अ.जा./अ.ज.जा. के लोग सुविधाभोगी होकर ज्यादा कमजोर, आलसी, तथा अप्रतियोगी होंगे और हजारों शताब्दियों तक पिछड़े बने रहेंगे। आरक्षण के सहारे सामान्य के बराबर आने तक सही रीति उत्थान हो पाएगा उनका? शायद सवर्णों ने ही अपने पापमोचन हेतु शनि-राहु-केतु हेतु दान-देने स्वरूप आरक्षण नीति लागू की है, जिससे उनके पाप व कुदशाओं को अपने सिर भोग वे अनन्त काल तक पिछड़े बने रहें? - अज्ञात

 

यदि उन्हें सामान्य वर्ग के बराबर आना है तो एकलव्य जैसे कठिन स्वाध्यायी और परिश्रमी बनना चाहिए, न कि सुविधाभोगी।

 

कुछ अ.जा./अ.ज.जा. के महान लोग ऐसे भी हैं, जो अपने नाम के आगे सरनेम ही नहीं लगाते और न ही किसी आरक्षण सुविधा का लाभ उठाते हैं। सामान्य वर्ग के समान ही रहकर अत्यन्त प्रतिभाशाली बने हैं। सचमुच वे पूज्य हैं। रामायण में जैसे भगवान राम ने केवट और शबरी को महत्त्व दिया था, वैसे ही वे हमारे भी सम्मान से पात्र हैं।