सिह का शनि
सिंह का शनि
समय की घडी चलती रहती है और सन्सार का पहिया अपने आप घुडकता रहता है । शनिदेव का आगमन सिह राशि मे होने वाला है,वह भी अपने पिता के घर पर,शनि सूर्य देव के ही तो पुत्र है,सूर्य देव दिखाना चाहते है,और शनि देव छुपाना चाहते है,जगत मे जो भी दिखाई देता है,शनिदेव के अनुसार सब झूठ है,अन्धकार सत्य है और रोशनी झूठ,जो दिखता है,वह है नही और जो है वह दिखाई नही देता है,जिसे देखो वही झूठ की तरफ़ भागा जा रहा है,हाय मेरा और हाय मेरा,कुछ समय बाद कही किसी का कुछ नही है,माता कहती है कि पुत्र मेरा है,कुछ समय बाद पत्नी कहती है कि पति मेरा है,और फिर पुत्र आ कर कहता है कि पिता मेरा है,लेकिन जब सन्सार से कूच करने का समय आता है,माता,पत्नी,पुत्र सब हाय हाय करते रह जाते है और आत्मा एक अन्जाने अन्धकार मे विलीन हो जाती है । अन्धकार जो मन को शान्ति देता है,अन्धकार जो शरीर को चिर विश्राम देता है,अन्धकार जो सत्य है,और अन्धकार जो योगियो को अच्छा लगाता है,अन्धकार जो चोरो को अच्छा लगता है,माया को हरने वाले चोर अन्धकार मे ही तो छिपते है,उजाले मे तो आना ही नही चाहते है,उजाले मे आने पर सब भेद खुल जायेगा,पहिचान हो जायेगी,माया नगरी सजा देगी,सजा भी कौन सी जिससे शरीर को कष्ट हो,शरीर को कष्ट मिलने पर आत्मा को कष्ट मिलेगा,आत्मा को कष्ट मिलने के बाद परमात्मा को कष्ट मिलेगा,परमात्मा को कष्ट मिलते ही प्रलय का कारण बनता है,प्रलय होती है तो पता नही होता है कि कौन सा पापी मर रहा है और कौन सा पुण्यात्मा,प्रलय मे मरते तो सभी है,हर घडी हर पल प्रलय चल रहा है,लोहा भी धीरे धीरे जन्ग लग कर खत्म हो रहा है,हर सान्स शरीर को खत्म कर रही है,हर दिन आत्मा को थका रहा है,जितना शरीर को पकाने की कोशिश की जाती है उतना ही क्षय हो रहा है। माया महा ठगनी हम जानी,ठगनी के चक्कर मे ही मत आओ,क्यो ठगे जाओगे,दूर रहो,सडक पर चलोगे तो टक्कर लगेगी,निकलो ही मत सडक पर देखे कैसे टक्कर लगती है,जिसे देखो वही कहता था,कितने अजीब है आप भदौरियाजी,अपने दरवाजे से बाहर ही नही निकलते है,निकले कहा से,झूठ मुझे नही आती,मसखरी मुझे नही आती है,जो कहु झूठ मसखरी जाना कलयुग सोइ गुण्बन्त बखाना,मुझे अपने हाल मे ही मजा लगता है,लोग लगातार क्यो भागते है,मेरे ख्याल से तो लगता है कि उनको अपनी आन बान शान का ख्याल है,जो जिसके ऊपर निर्भर है उसी से अपनी जीविका को चलाना चाहता है,कितनी ही बार कहा है कि युग बदलते ही अपने स्वभाव को बदलना पडता है,कागज के पहले भोज पत्र पर लिखा जाता था,जब भोज पत्र पर लोग पुराणो को सहेज कर नही रख पाते थे,तो वे कुम्हार का सहारा लिया करते थे,कच्ची मिट्टी पर लिख कर आग मे पका लिया करते थे,जो आग मे पका कर लख लिया जाता,वह हमेशा ही पढा जाता था,और एक किताब जो आज हम दो या चार रुपये मे लाकर पढ लेते है,वह उस जमाने मे आज के हिसाब से दो चार लाख की पडती होगी,ग्यान की कोई सीमा नही होती है,शनि देव की भी कोई सीमा नही है,गुरु केवल दिमागी हवा का ग्यान देकर बगल मे हो जाते है,करना तो शनि देव को पडता है,एक नदी मे पन्डितजी को पार जाने के लिये मल्लाह की जरूरत जरूर पडेगी,पन्डितजी के पास ग्यान तो है मगर कर्म नही,वे नाव के बारे मे जानते है,नाव मे जो भी कील लगी है जानते है,नाव किस तरह से पानी के ऊपर रहती है,उन्होने पढा है,मगर नाव चलाते वक्त क्या करना चाहिये उनको पता नही है,नाव को चलाने के लिये मल्लाह की ही जरूरत पडेगी,मल्लाह अगर नाव को बीच धार मे छोड दे तो पन्डितजी को बिना मौत के मरना भी पडेगा,और पन्डितजी को ग्यान के साथ अगर नाव को चलाने का भेद पता है,तो वे नाव को पार करवाने मे मल्लाह की मदद भी कर सकते है,जब गुरु ग्यान को शनि के कर्म को दे वही जिन्दगी सर्वोपरि होती है,लेकिन अगर कर्म ग्यान के ऊपर हावी हो तो ग्यान को पन्डितजी की तरह से बीच धार मे डूबना पडेगा,कोई बचाने बाला नही है,हा अगर गुरु के भाग्य से नदे ही सूख जावे तो कोई आश्चर्य नही,जैसे भदावर के कुए पहले किसी के गिरने से सूख जाते थे।

