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ग्रह भगवान की तरफ़ जाने का रास्ता देते हैं

भारतीय ज्योतिष मे भदावरी ज्योतिष के प्रयोग भदावरी ज्योतिष मे भगवान सूर्य सूर्य ग्रह के कारकत्व सूर्य के अन्य ग्रहो के साथ कार्य सूर्य+मन्गल सूर्य+बुध सूर्य+गुरु सूर्य+शुक्र सिह का शनि शनि+गुरु+मंगल=आरक्षण श्री गणेशजी प्राण क्या है ? ग्रह भगवान की तरफ़ जाने का रास्ता देते हैं गोचर कैसे काम करता है?



ग्रह ही भगवान की तरफ़ जाने का रास्ता देते हैं
संसार मे भाग्यवान पुरुषों की कमी नही होती है,धर्म को हर कोई कर सकता है,बस जरा सी समझायश होनी चाहिये,अर्थ को हर कोई कमा सकता है,बस थोडी सी बुद्धि की जरूरत होती है,संतान आदि मे व्यक्ति फ़लीभूत हो सकता है,बस थोडी सी शरीर मे ताकत होनी चाहिये,मगर मोक्ष की तरफ़ जाने मे हर किसी को जोर लगता है,आदमी अपने अन्दर मोक्ष को लाना तो चाहता है,मगर भौतिक तरीको से,वास्तविक तरीको से मोक्ष के लिये साधना की जरूरत पडती है,साधना के साथ भी आत्म शोधन सभी से नही हो पाता है,गूगल की ओरकुट साइट पर मैने इस भौतिक जगत मे भी कितने ही प्रकार के महात्मा देखे हैं,पुराने जमाने मे ज्ञान को बाटने के लिये लोग मेला,सन्गत,मन्डली,सभा,और प्रवचन का सहारा लिया करते थे,मगर आज के भौतिक जगत मे हर आदमी को काम करना पडता है,कम से कम शरीर के पालन के लिये तो जरूरी है,और साथ अकर्म को ह्टाने के लिये,इस साइट पर श्री मान नवनीतजी से भी मुलाकात हुई,वे नागल पंजाब मे पैदा हुए हैं,उनकी जन्म तारीख ३० नबम्बर १९७८ है और समय है शाम के चार बजे का,जिस समय श्री नवनीतजी ने जन्म लिया है,सितारे पुकारने लगे कि एक ऐसे साधक का जन्म हुआ है जो अपने पिछले जन्म मे अपने छोटे बाही बहिनों की परवरिश के कारण मोक्ष की तरफ़ नहीं जा आया था,और आत्मा का भटकाव दुबारा इस भूमि पर ही लाया कि कैसे भी इस साधक को मोक्ष मिले,ज्योतिष मे मैने सीखा है कि कुन्डली का चौथा,आठवां और बारहवां भाव ही मोक्ष स्थान का त्रिकोण है,इस त्रिकोण मे अगर किसी प्रकार से गुरु और सूर्य की युती मिलती है,और राहु शनि इस त्रिकोण से बाहर होते हैं,तो जातक का प्रयास अपने लिये संसार की सर्वोपरि उपलब्धि प्राप्त करने की तरफ़ हो जाता है,उसको मोक्ष मिल भी जाता है,अगर गुरु के प्रति कोई लान्छन लगाने बाला ग्रह नही होता है,लान्छन का मतलब होता है,कि कोई भी ग्रह उसे समाज मे रहने के लिये आकर्षित करे,जब कोई ग्रह जातक को आकर्षित करेगा,तो जीव माया और लोभ मोह मे फ़ंसेगा,इसी मे फ़ंस कर जीव मोक्ष मे जाने के साधनो की तरफ़ से अपने को बिलग कर लेगा,श्री नवनीतजी की कुन्डली मे सप्तम का त्रिकोण पूरी तरह से मोक्ष की तरफ़ ले जाने का मार्ग बता रहा है,गुरु सोचने मे,केतु प्राप्त करने मे,सूर्य,चन्द्र,बुध और मन्गल जीवन मे विरोधी भाव से उनके प्रति दैहिक,दैविक,और भौतिक रूप से संघर्ष करने के प्रति सूचना देते हैं,जो लोभ,मोह और माया के प्रति आकर्षण देने वाले ग्रह जातक से दूर है,माया रूपी स्त्री कुन्डली मे छठे भाव मे है,छठा भाव कर्जा दुशम्नी,बीमारी देने बाला है,जब माया रूपी नारी ही जीवन की जद्दो जहद को समेटने मे अपनी भूमिका को सामने करना चालू कर दे तो जातक का मन नारी की तरफ़ से विरक्त हो जाता है,इसी प्रकार से श्री नवनीत जी की कुन्डली मे चौथे भाव मे शनि के विद्यमान होने से माता मन मकान,पानी के साधन,और जानकार लोगों से अन्धकार ही मिलता है,जीवन की जद्दोजहद और महिलाओ की तरफ़ से माया की चमक जो छुपी हुई है,को खोजने के चक्कर मे जातक अपने जानकार लोगो से इतना कुछ लेलेता है,जो दे नही पाता है,चौथा शनि लिया हुआ दे नही पाता है,और जब जातक वापस करने मे असमर्थ हो जाता है,तो मन अपने आप को अन्धेरे मे लेजाकर बिठा देता है,राहु की तरफ़ शनि की चाल है,कर्म जो कि सबसे आगे के ग्रह से अपने लिये भौतिक साधनो को प्राप्त करना चाहता है,क्न्या का राहु,उन कारणो को खोजना जो छुपे हुए हों,छ्ठा घर बचत का घर माना जाता है,बचत बाले कामो का घर माना जाता है,विश्लेष्ण करने का घर माना जाता है,धन प्राप्त करने के लिये दैनिक रूप से कार्य करने का घर माना जाता है,और छठा घर ही राहु को लेकर उन कारणों को भी धीरे धीरे खत्म करने करने की कोशिश करता है,जो जाल की तरह से जातक के आगे पीछे होते है और जातक समझता है,कि वह कितने ही भ्रमजालों मे फ़ंसा जा रहा है,मगर कन्या का राहु,उस जाल को चूहे की तरह से गुप चुप रूप से काटता रहता है,और जो आशन्काये जीवन के प्रति हमेशा मन मे रहती है वे जीवन साथी के प्रति,धर्म के प्रति,लाभ और दोस्तों के प्रति,तथा शरीर के प्रति ही मिलती हैं । राहु पंचम मे विराजमान है,कन्या का राहु खोजी आदत का होता है,कन्या का राहु छुपे हुए भेदों की जानकारी करना चाहता है,मगर कन्या राशि सूर्य के घर सिह मे अपना स्थान बनाकर बिराजमान है,और जो भी खोजा जाता है वह आत्मा के प्रति खोजा जाता है,यही राहु जब आत्मा के प्रति खोजता है,तो वह ज्योतिष के प्रति भी अपनी रुचि को जाहिर कर देता है,पंचम स्थान विद्या का घर है,और राहु पंचम स्थान में ही है,विद्या को खर्च करने का घर चौथा स्थान है,चौथे स्थान मे शनि देव विराजमान है,जैसे ही किसी को अपनी योग्यता के बारे मे बताने की कोशिश की जाती है,अपनी प्राप्त शिक्षा को खर्च करने का समय आता है,दिमाग मे अक्समात अन्धेरा आजाता है,उस अन्धेरे का कारण जो बनता है उसका कारण भी अजीब है,गुरु और राहु के बीच मे फ़ंसा शनि,ज्ञान और गुप्त शिक्षाओं के बीच मे कर्म,ज्ञान का रुख भी कर्म की ओर नही है,गुरु बक्री हैं,कर्म की वजाय धन की तरफ़ देखते हैं,जब कर्म किया ही नही जायेगा,तो धन कहां से प्राप्त होगा,केतु और गुरु का त्रिकोणात्मक संपर्क है,जीव बिना कर्म किये ही धन चाहता है,जब कर्म को बिना किये फल की आशा की जाती है तो फल मे केतु का प्रबाह्व शामिल हो जाता है,केतु जो ग्यारह्वें भाव मे एक ऐसे दोस्त का रूप लेता है जो अपनी आठवी नजर से खुद की पत्नी को दोस्त के हवाले कर देता है,और जातक को अपनी ही जीवन सन्गिनी के प्रति शक की बीमारियां दिमाग मे पैदा हो जातीं हैं,और उस शक से पत्नी भाव नष्ट हो जाता है,दूसरा पत्नी भाव के नष्ट होने का शुक्र का राहु और सूर्य के बीच मे फ़ंसा होना भी है,पाप कर्तरी योग बन जाता है,और पत्नी संतान देने मे अस्मर्थ हो जाती है,जब जातक के सन्तान ही नही होती तो उसको अपने आप ही मोक्ष मिल जाता है,वैसे भी पंचम राहु बच्चे खाने वाला सांप माना जाता है,श्री नवनीतजी को मोक्ष तो मिल सकता है अगर उनका ध्यान बक्री गुरु के कारण धन और भौतिकता से परे हट जाये तो,अपने सहयोगियो से अपने लाभ की इक्षा नही सोचे तो,जिम्मेदारी वाले पदों पर जाने के लिये और लोगो को जो भी ज्ञान दिया जाता है उसमे नगद धन प्राप्त करने की भावना न हो तो,ध्यान समय मे अधिक स्त्री सन्सर्ग करने के उपरान्त जो यौन सम्बन्धी बीमारियां मिलती है उनसे बच जायें तो.